वैश्वीकरण और भाषायी संतुलन
- ओम विकास
- भौतिक और आध्यात्मिक विकास का असंतुलन समाज और राष्ट्र विश्रंखित कर देता है।
- समाज की इकाई व्यक्ति है, जो अपनी भाषा के सहारे समाज को बनाता है, बढ़ाता है और परंपरा से जुड़कर भविष्य का निर्माण करता है।
- लोक भाषा में सहजता है, वसंत सी उमंग है, संवेदना है, रचना धर्मिता है, नवीनता की कल्पनाशीलता भी।
- समाज का शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, उद्योग के स्तर विकास के सूचकांक बनाते हैं।
- इन्नोवेशन अर्थात् नवाचार, नवीन आविष्कार हर क्षेत्र में उत्पादकता और दक्षता बढ़ाने के लिए आवश्यक है। इन्नोवेशन आर्थिक प्रगति का मूल है।
- इन्नोवेशन समाज की सेहत के लिए महत्वपूर्ण विटामिन है, इसका संवर्धन लोक भाषा में आसान है, अन्यथा अत्यंत दुष्कर।
- भारत बड़ा देश है, लोकतंत्र है, सहजता-सम्पन्न है। लगभग 1650 बोलियां हैं, लिपि लेखन व साहित्य की दृष्टि से 20 के करीब समृध्द भाषाएं हैं।
- लिपि भेद से विभिन्नता है, लेकिन संस्कृति और सोच में समानता है। विविधता में एकता है।
बाहरी आक्रमणों से आहत हुए अलग-अलग छोटे-छोटे राज्यों को बाहरीशक्तियों ने जीता, दबोचा, साहित्य, कला और पारंपरागत ज्ञान को तहस-नहस किया, ध्वस्त किया। इस प्रकार समाज का मौलिक चिंतन और आविष्कारोंन्मुखी नवाचारमय दृष्टिकोण अवरूद्ध हुआ।
स्वतंत्र भारत की चुनौतियां हैं -
1. सर्व शिक्षा, 2. सर्व स्वास्थ्य, 3. सर्व न्याय,
4। विकास में लोगों की भागीदारी
विश्वभर की ज्वलंत समस्याएं हैं -
1. मंहगाई, 2. नौकरियों में कमी, 3. आतंक,
4। पर-दोषारोपण
- चुनौतियों और समस्याओं के संदर्भ में लोकभाषा महत्वपूर्ण है। निज भाषा उन्नति को मूल।
- योजनाएं बिजनेस मॉडल पर आधारित हों, कम खर्चे में अधिक लाभ, अधिक पिपुल पार्टिसिपेशन, 80:20 मेनेजमेंट सिध्दांत के आधार पर बहुसंख्य लोगों की लोकभाषा केन्द्रित हों।
- व्यक्तिगत नवाचार अंग्रेजी में हो सकता है, लेकिन समूचे समाज का नवाचार, आविश्कारों और सुधार-तकनीकों के आंकड़े लोकभाषा के माध्यम से ही बढ़ाए जा सकते हैं।
- ज्ञान-आयोग ने वैश्वीकरण के संदर्भ में अंग्रेजी की महिमा बतायी है। शायद औरों से काम लेने के मकसद से। लेकिन इससे भारत के समाज में अपने काम पैदा करने की शक्ति नहीं बढ़ेगी। परिणाम, भारत परमुखापेक्षी बनने लगेगा, जो स्वतंत्र भारत की प्रकृति के विरूद्ध है।
- विकास के तीन चरण होते हैं - 1। Catch-up Phase, 2. Competitive Phase, 3. Commanding Phase
कैचप फेज में भारत ने बहुत तरक्की की है -खाद्यान्न, इन्फोमेशन टेक्नोलॉजी, न्यूक्लीयर पावर, उद्योग-प्रबंधन, इत्यादि। अब, कम्पटीटिव फेज में योजना बनें, जिसमें हम चुनौतियों का सामना करें, निर्धारित लक्ष्यों को कम समय कम में और लागत में पाएं; और विकास की गति और सातत्य को सुनिश्चित करने के लिए लोगों की भागेदारी को बढ़ावें, लोगों के इन्नोवशन नवाचार प्रवृत्ति को प्रोत्साहित करें। यह सब केवल मात्र लोकभाषा में ही सम्भव है।
- ज्ञान-आयोग की रिपोर्ट में बस इतना सुधारना है कि भारत में अंग्रेजी-साक्षरता 10-20 प्रतिशत पर्याप्त है, शेष भारत सहज चिंतन से समृद्धि में भागीदारी कर भारत को अग्रणी बनाएगा।
- समाज में उतार चढ़ाव तो आते हैं, लेकिन सजग रहना है कि हम अपनी जमीन से भी न उखड़ जावें। महात्मा गांधी ने भी चेताया था, ''सब दिशाओं से ज्ञान आए, संस्कृतियाँ आवें, लेकिन इनकी हवा से ऐसा न हो कि अपने पैर उखड़ जाएं।''
- राष्ट्र स्तर की योजनाओं में भूल होने का मुख्य कारण है, लोगों की उदासीनता। अत: उतिष्ठ, जाग्रत, वरान्निबोध।
- आज आवश्यकता है योजनाओं को लोकपरक कसौटी पर परख कर स्वीकृति देने की, अथवा अस्वीकृति का बिगुल बजाने की।
- तेजी से विकास के लिए सभी योजनाओं में लोगों की सहजतापूर्ण भागेदारी हो।
सामाजिक संवदेना, कल्पनाशीलता, रचनाधर्मिता की बीज-प्रवृत्ति का रोपण बचपन में 10 वर्ष तक लोकभाषा में ही आसानी से, सहजता से होता है।
- विश्वस्तर पर कारोबार के लिए विदेशी भाषा का ज्ञान किया जाए। केवल अंग्रेजी ही नहीं, अन्य विदेशी भाषाओं को भी प्रोत्साहित किया जाए। फ्रेंच, जर्मन, स्पैनिश, जापानी, रशियन, चाइनीज, कोरियन आदि भी बहुत महत्वपूर्ण हैं।
- चिंता न करें, पर चिंतन जारी रखें। हिन्दी लोकप्रिय हो रही है। जैसे-जैसे समृध्दि बढ़ रही है, हिन्दी भी सुदृढ़ हो रही है। हाँ, स्वरूप बदल रहा है - ट्रांजीशन फेज है। संक्रमण काल की हिन्दी में टैक्नीकलशब्द अंग्रेजी के हैं, संक्षेपाक्षर कभी कभार रोमन में भी। कोई परेशानी की बात नहीं। ग्राह्यता बढ़ी है। अंग्रजी के विज्ञापनों में हिन्दीशब्दों का प्रयोग बढ़ रहा है। टीवी चैनलों पर हिन्दी में प्रसारण बढ़ा है। न्यूज पेपर भी औद्योगिक गतिविधियों को हिन्दी में लाने लगे है। हिन्दी में इकोनोमिक टाइम्स अच्छी शुरूआत है। वेब पर ब्लॉग लेखन बढ़ रहा है।
हिन्दी को सशक्त बनाने के लिए सुनिश्चित करिए-
-१- टेक्नोलॉजी का प्रयोग सरल, सुबोध, सुलभ बनाएं
-२- सभी योजनाओं की सीमक्षा ''लोगों की भागीदारी'' के परिप्रेक्ष्य में होती रहे।
-३- सभी सरकारी अनुदान प्राप्त संगोष्ठियों में अनिवार्यत: लोकभाषा में हो। कम से कम 20 प्रतिशत पेपर और चर्चा-सत्र लोकभाषा में हो।
- उठो, उठाओ, उड़ जाओ
मिलकर छूलो आसमान भी।
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Written on Thursday, May 15, 2008 by कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee
वैश्वीकरण और भाषायी संतुलन : ओम विकास
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आलेख,
भाषा
2 Comments
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2 Responses to "वैश्वीकरण और भाषायी संतुलन : ओम विकास"
Friday, May 16, 2008 2:41:00 AM
उठो, उठाओ, उड़ जाओ
मिलकर छूलो आसमान भी।
Tuesday, June 03, 2008 4:37:00 PM
बढिया लेख है। हिंदी के बोलने वाले जब तक है, हिंदी को कोई क्षति नहीं पहुंचा सकता। लोगों कॊ हज़ारों वर्ष की गुलाम मानसिकता छोडने में समय तो लगेगा। आज के बाज़ार में तो हिदी प्रचलित हो ही रही है।
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